जगद्गुरु स्वामी ब्रह्मानन्द जी महाराज

जगद्गुरु स्वामी ब्रह्मानन्द जी महाराज

पूज्य स्वामी जी महाराज का आविर्भाव पोष सुदी प्रतिपदा विक्रम संवत् 1965 तदानुसार 24 दिसंबर 1908 ई. दिन बृहस्पतिवार को हरियाणा प्रान्त में गीता ज्ञान की गौरवमयी पवित्र भूमि धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र (पलकवन फल्गु तीर्थ) के समीप वीतराग चुहड़मुनी की पावन धरा ग्राम चुहड़माजरा में रोड क्षत्रिय वंश में हुआ। ऋषियों की कर्मभूमि पर श्रध्देय स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जैसी तेजस्वी ओजस्वी विमल विभूति को जन्म देकर भारत माँ का मस्तक गौरवान्वित है| जिसके पिता जी का नाम चौधरी बदामा व माता का नाम रामी देवी था। गुरुजी के बचपन का नाम छोटा राम जो बाद में चलचलकर जगद्गुरू ब्रह्मानंद नाम से जाने गए। गुरु जी ने माता पिता की सेवा पर पूरा ज़ोर दिया।

माता पिता और गुरु इन तीनों से ही विधा शुरू|
इनको जो फटकारे वह फिरते हैं मारे मारे ||

स्वामी जी ने अपनी अमर कृति सद्गगुरु ब्रह्मानंद पचासा जिसको अब तामरपत्रों पर उकेरा गया है (क्रम, शैशव, अध्यात्म व नीति) आदि गुण तत्वों की सरलतम व्याख्या सहित अमूल्य धरोहर समाज को सौंपी। इसके अतिरिक्त सद्गगुरु ब्रह्मा+ ब्रह्मानंद, सद्गगुरु नीति विचार शारिक कोप निबंध व अन्य साहित्य लिखा जो हरियाणा के विश्वविद्यालयों में स्नातक व स्नातकोत्तर कक्षाओं के पाठ्यक्रमों में पढ़ाया जाता है तथा स्वामी जी के साहित्य पर अनुसंधान चल रहा है जिसके आधार पर दर्जनों विधार्थी Ph. D व M. Phil की उपाधि प्राप्त कर चुके हैं वह अन्य कार्यरत हैं| दिन 16 मई 1973 वैशाख सुदी पूर्णमासी के दिन ओउम का पवित्र उच्चारण करते करते अपने पंचभौतिक पार्थिव शरीर का त्याग करो वो लंगोटी बंद फ़क़ीर स्वप्नद्रष्टा सभी प्रकार की सीमाओं से ऊपर उठ कर इंसानियत को नमन करते हुए भेद भाव के विष को ख़त्म करने का अमर संदेश देकर उच्च़कोटि का वह कलाकार समस्त संसार को कला-कौशल दिखाता हुआ अपनी ही कला में समा गया|